हर एक की अपनी मजबूरी है
पर उसको समझना जरूरी है।
जरूरतें बहुत है, पर साधन सीमित है
आकांक्षाओं की परिधि तो असीमित है।
समझना पहले है, समझाना अगली कड़ी में शामिल है,
बनाने वाला ही जानता होगा कौन किसके काबिल है।
बहुत सी बातें अनकही रह ही जाती हैं
कहां हर ख्वाहिश पूरी हो पाती है।
उचित-अनुचित का फैसला उसी पर छोङ देते हैं
बनाने वाले की फितरत पे क्यूं तोहमत लगाते हैं
चुभन तभी होती है जब कांटों से टकराते हैं
कहा यही जाता, सब करनी का फ़ल खाते हैं।
अच्छा करने से पहले अच्छा सोचने की आदत लगाते हैं
चलो दिल से दुआओं की महफ़िल सजाते हैं।
दुआओं की महफ़िल सजाते हैं
Comments
9 responses to “दुआओं की महफ़िल सजाते हैं”
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चलो दिल से दुआओं की महफ़िल सजाते हैं।
…..यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई अति उत्तम रचना, उम्दा लेखन-

Sadar dhanybad
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बहुत खूब
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सादर आभार
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अतिसुंदर रचना
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बहुत बहुत धन्यवाद सर
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दुआ जरूर मदद करती है। दुआ से ईश्वर सुनता है। बहुत खूब
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सादर आभार सर
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बहुत खूब
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