देखो श्राद्ध आ गए
स्वर्ग लोक से पितृ
देख रहे अपने पुत्रों को
देखो श्राद्ध आ गए
हंस रहे अपनी ही परंपराओं पर
सोच रहे काश जीते जी
भी कोई क्रिया या करम होता
तो भूखा न मरता
आज पंडित बुलाकर
मेरी पसंदीदा भोजन
खिला रहे है
जिनको मैं हमेशा तरसता था
आज इंसानों को तो
खिलाया ही
सुना है कव्वे को भी
बुलाया है
मेरे इलाज को
पैसे न थे
आज दान दक्षिणा में
खूब पैसा लुटाया है
अंधेरे कमरे में सोता था
आज सुबह से
फोटो के शीशे साफ करके
दीपक भी जलाया है
क्यों भूल जाते है
बेटे भी कभी बाप बनेंगे
जैसा बोएंगे
वैसा ही काटेंगे
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