देर है ,अंधेर नहीं!

कहां है वो ,
सबकी नींव धरने वाला!
सबका दाता कहलाने वाला!

कैसे खा गए , वो दरिंदे
उस कच्ची सी कली को,
बहुत ख़रोंचे है, मोम जैसे हाथों पर !
निकली है बाहर आंखें,
मक्खियां है मुंह और नाकों पर!

कितना कराहई होगी वो और
कितना चिल्लाई भी होगी
मगर किन्नर सा समाज ,
अंधा सा,बहरा सा,
अपनी आई पर  ही रोता है।

भगवान को भी बहुत पुकारा उसने,
दयालुता को उसकी ललकारा उसने,
मगर उसको तो देर करनी  ही होती है
क्योंकि उसके दर पर ,
देर है अंधेर नहीं!
    
            ——-मोहन सिंह मानुष

Comments

10 responses to “देर है ,अंधेर नहीं!”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    🙏 धन्यवाद जी

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      🙏 धन्यवाद जी

  2. भावपूर्ण रचना

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद जी 🙏

      1. Abhishek kumar

        वेलकम

  3. Satish Pandey

    वाह जी वाह

  4. Pratima chaudhary

    बहुत ही मार्मिक

  5. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    🙏🙏

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