मधुमक्खियां
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कालबेलिया नृत्यांगना सी रंगत…. छरहरी…
बिजली सी फुर्तीली, योद्धा …..
डंक हथियार लिए…
घुमंतू…
चकरी सा नृत्य कर जब तेज स्वर में बजाती है सारंगी सी धुन…
तो मादकता बिखर जाती है हवाओं में,
फूल डूब जाते हैं
वाद्ययंत्रों सी
मधुर आवाज में..
उन्हें मग्न देख..
चुपचाप किसी चिकित्सक की भांति
इंजेक्शन रूपी सूंड़ से
खींच लेती हैं मकरंद,
ठीक उसी पल अपने पंखों से फूलों को सहला…
चिपका लेती है परागकण
और चल देती है प्रकृति द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी का निर्वाह करने…
पेड़ पौधों की संख्या बढ़ाने….
आधा लीटर शहद बनाने के लिए……. बीस लाख फूलों से मकरंद चूस .. एक लाख किलोमीटर की यात्रा कर,
हजारों साल तक खराब न होने वाला अमृत रूपी शहद बनाने और
धरा को हरा भरा रखने…
इस चिंता के साथ…
कहीं खत्म न हो जाए जीवन!
मानव यह हरियाली और
उपहार समझ नहीं पाते अपने कर्मों से लाचार,
लालची बन …छीनते रहते हैं शहद के लिए उनका घरद्वार..
जो बनाती है बेचारी मधुमक्खियां अपने पेट की ग्रंथियों के मोम से
बार बार।
भूल गए हैं शायद!
आइंस्टीन का कथन..
“यदि सारी मधुमक्खियां गई मर
चार वर्ष में खत्म हो जाएगा
इस धरा का हर घर।”
निमिषा सिंघल
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