दो डॉक्टर बर्ताव के !
एक कड़वी दवा खिलाएं,
दूजा मीठी दवा पिलाएं,
‘मानुष’ मीठी से करें परेहज
नीम ही नीरोगी होए।
दो डॉक्टर बर्ताव के
Comments
11 responses to “दो डॉक्टर बर्ताव के”
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Wah wah
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धन्यवाद भाई साहब
शायद आपको भाव समझ में आ गया होगा।
बहुत बहुत हार्दिक आभार 🙏
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पंक्तियों का भाव –>समाज में दो तरह का व्यवहार करने वाले मनुष्य है ,
एक तो बिना किसी भेदभाव के सच बोलने वाले लोग होते हैं और दूसरे झूठ बोलने वाले एवं चापलूसी करने लोग होते हैं।
आजकल सच बोलने वाले को कड़वी दवा की तरह ,कम और चिकनी चुपड़ी बातें करने वाले को मीठी दवा की तरह ज्यादा पसंद किया जाता है मगर मेरे अनुसार सच्चा इंसान नीम की तरह कड़वा मगर रोगमुक्त सा, स्वार्थमुक्त होता है।
उम्मीद है भाव पसंद आएगा आप सभी को 🙏🙏-
बहुत अच्छा
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सादर धन्यवाद सर
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Wah wah
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बहुत बहुत आभार सर
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बहुत सुंदर भाव मोहन जी। बहुत गहराई है आपकी कविता में।
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समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मैडम जी
आप लोगों का ही प्रेम है जो लिखने का हौसला बढ़ता है
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सही कहा।
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बहुत बहुत धन्यवाद
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