क्यूँ इन्सान के चेहरे पर नकाब चढ़ा
ऐसा की कोई अपना ही
दगाबाज बन कर निकला ।
सूरत देखकर गैरो पे भरोसा करना
अपने पैरों को जले तवे पर रखना
अपनेपन से चढ़ा खुमार, कहाँ गहरा निकला।
कभी किसी को संदेह से नहीं देखा हमने
अपने तो क्या गैरो को भी
ना परखने की कोशिश की हमने
समझा था कंचन जिसे, वो तो अयस निकला।
मन चाहे कुछ ऐसा यहाँ कर दे
उन जैसों की असलियत सामने रख दे
फिर आँख न उठा पाए किसी पे
पर हिम्मत नहीं, अहम् मेरा भीरु निकला।
नकाब चढ़ा हर चेहरे पर
Comments
3 responses to “नकाब चढ़ा हर चेहरे पर”
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बहुत खूब
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बहुत खूब
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सही कहा आपने
नकाब चढ़ा हर चेहरे पर
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