सागर-सी गहराई बिन।
नदी सुहानी पानी बिन।।
नाच के हाथी नहा रहा था।
और जहाज भी आ रहा था।।
बूटा-बूटा पत्ता -पत्ता
गिरिवर भी हर्षा रहा था।
‘विनयचंद ‘ ले रिक्त घड़ा
बीच नदी पछता रहा था।।
नदी सुहानी पानी बिन
Comments
12 responses to “नदी सुहानी पानी बिन”
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बहुत खूब, क्या बात है
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धन्यवाद
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अतीव सुन्दर
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धन्यवाद
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वाह वाह, बहुत खूब, सुन्दर अभिव्यक्ति
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत ही लाजवाब
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शुक्रिया जनाब
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बेहतरीन
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धन्यवाद
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बहुत सुंदर भवाभिव्यक्ती है भाई जी ।आपकी कविता में बहुत गहराई है ।
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बहुत बहुत धन्यवाद बहिन
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