नेक दिशा में

अंक गणित समझे बिना, लगा लिए थे अंक,
धीरे-धीरे उग गए, उल्टे सीधे पंख।
उल्टे-सीधे पंख, मार्ग विचलित करने को।
हार्मोन भी स्रवित थे भ्रमित करने को,
बोले कलम यदि हो, कोई राजा या रंक,
नेक दिशा में पंख, लगें तो ले लो अंक।

Comments

9 responses to “नेक दिशा में”

  1. अति उत्तम रचना

    1. बहुत धन्यवाद

  2. वाह, बहुत खूब

  3. बहुत खूब,अति सुंदर रचना

    1. सादर धन्यवाद

  4. Geeta kumari

    यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग करती हुई कवि सतीश जी की छंद बद्ध बहुत सुंदर रचना, अति उत्तम लेखन

    1. इस प्रेरक समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

  5. अच्छा लगा

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