कहीं आग कहीं पानी

बहुत हो चुकी नफरत की आग
जल रहे हैं दिल के जंगल
मुहोब्बत कर चुके हैं खाक,
अब नहीं रही वैसी धाक
जो एक नजर पर
चुरा ले जाती थी दिल,
अब तो नजरें मिला पाना भी
हो गया है मुश्किल,
क्योंकि सच सामने आते ही
रिश्तों की बुनियाद जाती है हिल।
कहीं आग है
कहीं पानी है,
फिर भी न बुझा पाये तो
हमारी नादानी है।

Comments

8 responses to “कहीं आग कहीं पानी”

  1. वाह बहुत खूब कहा है

    1. बहुत धन्यवाद

  2. Seema Chaudhary

    लाजवाब अभिव्यक्ति

    1. सादर धन्यवाद

  3. Geeta kumari

    कहीं आग है
    कहीं पानी है,
    फिर भी न बुझा पाये तो
    हमारी नादानी है।
    ************जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराती हुई बहुत सुन्दर रचना। शिल्प और भाव का सुंदर समन्वय

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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