अंधा ना कहो आँखों वालों,
मुझे नेत्रहीन ही रहने दो।
आँख नहीं ग़म का सागर है,
कुछ खारा पानी बहने दो।
तुम क्या समझो आँखों का न होना,
एक छड़ी सहारे चलता हूं।
अपने ही ग़मों की अग्नि में,
मैं अपने आप ही जलता हूं।
कभी सड़क पार करवा दे कोई,
मैं उसे दुआएं देता हूं।
देख नहीं पाता हूं बेशक,
महसूस सदा ही करता हूं।
यह दुनिया कितनी सुंदर होगी,
चाँद, सितारे सूरज इनके बारे में सुनता हूं।
कभी देख पाऊं इनको मैं,
ऐसे ख्वाब भी बुनता हूं।
सुना है करने से नेत्र दान,
दुनियां देख सके एक नेत्रहीन।
क्या तुम भी करोगे नेत्रदान
मैं भी देख सकूं इस संसार को,
दूंगा ढेरों दुआएं तुम्हें
और तुम्हारे परिवार को।।
____✍️गीता
*नेत्रदान*
Comments
10 responses to “*नेत्रदान*”
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बहुत सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏
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बहुत सुंदर रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद पीयूष जी
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वाह क्या खूब
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धन्यवाद
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नेत्रदान महादान 🙏 वाह, बहुत सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद सर
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अंधा ना कहो आँखों वालों,
मुझे नेत्रहीन ही रहने दो।
आँख नहीं ग़म का सागर है,
कुछ खारा पानी बहने दो।
—- वाह, जीवन से जुड़ी बेहतरीन कविता की सृष्टि की है आपने। बहुत खूब, एक श्रेष्ठ रचना।-
आपकी समीक्षा शक्ति को अभिनंदन सतीश जी, बहुत-बहुत धन्यवाद
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