नोच खाने को बैठी है एक ज़िन्दगी

एक नज़र चाह कर भी मिलाने को तैयार नहीं,
ज़िन्दगी एक पल भी सर उठाने को तैयार नहीं,

नोच खाने को बैठी है एक ज़िन्दगी ज़िन्दगी को कैसे,
क्यों एक लम्हा भी कोई ठहर जाने को तैयार नहीं।
राही (अंजाना)

Comments

3 responses to “नोच खाने को बैठी है एक ज़िन्दगी”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

  2. Abhishek kumar

    Nice

  3. Pratima chaudhary

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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