पत्थर भी पिघलता है

जब प्यास से व्याकुल होकर धरती चिल्लाती है
चट्टानें भी रो पड़ती हैं
अपनी आंखों से झरना बहा देती हैं
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

मां जब बेटी की विदाई के बाद
दीवार में सर रखकर रोती है
मैंने उस दीवार को पिघलते देखा है तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

पिता के सामने बेटी जब
विधवा खड़ी होती है
स्वर्ग से देवता रो पड़ते हैं
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

सावन के महीने जब
दूर जाता साथी है
आकाश भी रो पड़ता है
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

क्रोंच वियोग का दृश्य हो
फिर चाहे वह रत्नाकर हो या महर्षि हो
पत्थर दिल भी रो पड़ता है
तब लगता है
पत्थर भी पिघलता है

Comments

3 responses to “पत्थर भी पिघलता है”

    1. धन्यवाद चाचा जी

  1. बहुत सुन्दर 

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