पुत्र मोह में लिपटे प्राण-पखेरू भी उड़ चले आज
बलि वेदी पर राजा दशरथ भी चढ़ गए आज
कैसी विपदा आन पड़ी अवध नगरी पर
जो फली- फूली थी उपवन सी अकस्मात ही उजड़ गई
प्रेम की फूली डाल अचानक ही लद कर टूट गई
हाय कैकेई! तेरी कैसी मति गई थी मारी
कोमल हृदय वाले राम की जो तूने
ऐसी स्थिति कर डाली
क्यूँ ना फटा ह्रदय तेरा जब तूने ऐसे वरदान लिये
राम चले वनवास और राजा दशरथ के प्राण गए
आँख खुली जब भरत ने कैकेई को त्याग दिया
राम की चरण पादुका लेकर खुद भी वनवास किया
जय हो भरत लाल की ऐसा भाई सबको मिले सदा
राज्य से परम भ्रात भक्ति संसार में जीवित रहे सदा
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