आज जितना भी बरसता है
बरस जाने दो,
फिर तो सावन भी चला जायेगा,
सींच कर कोना-कोना धरती का
फिर तो सावन भी चला जायेगा।
आज जितना भी चाहो भीगो तुम
प्यार ही प्यार भरा मौसम है,
प्यार में भीगते-भिगाते रहो,
फिर तो सावन भी चला जायेगा।
प्यार में भीगते-भिगाते रहो
Comments
10 responses to “प्यार में भीगते-भिगाते रहो”
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N ic e
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सादर धन्यवाद शास्त्री जी
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बहुत ही बढ़िया
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सादर धन्यवाद
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Acha
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धन्यवाद
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bahut khoob
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धन्यवाद
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बहुत खूब
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nice
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