दोष नहीं दर्पण का थोड़ा
सदा सत्य दिखलाता है।
कपटी क्रूर कपूत घमण्डी
दर्पण को दोषी कहता है।।
सत्य असत्य के चक्कर में
पत्थर से पंगा मत लेना।
देख ‘विनयचंद ‘सीसा हो तुम
इसको मत भुला देना।।
पत्थर से पंगा मत लेना
Comments
8 responses to “पत्थर से पंगा मत लेना”
-

बहुत अच्छी
सादर धन्यवाद
सुन्दर कविता -
अति सुंदर
-
मनुष्य को सत्य ,असत्य के बारे में भान कराती सुंदर रचना।
-

सुन्दर
-
बहुत अच्छी कविता
-
👌✍🙏
-
Nice Poetry
-

Good
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.