पत्थर से पंगा मत लेना

दोष नहीं दर्पण का थोड़ा
सदा सत्य दिखलाता है।
कपटी क्रूर कपूत घमण्डी
दर्पण को दोषी कहता है।।
सत्य असत्य के चक्कर में
पत्थर से पंगा मत लेना।
देख ‘विनयचंद ‘सीसा हो तुम
इसको मत भुला देना।।

Comments

8 responses to “पत्थर से पंगा मत लेना”

  1. बहुत अच्छी
    सादर धन्यवाद
    सुन्दर कविता

  2. अति सुंदर

  3. Geeta kumari

    मनुष्य को सत्य ,असत्य के बारे में भान कराती सुंदर रचना।

  4. बहुत अच्छी कविता

  5. Prayag Dharmani

    Nice Poetry

  6. Kundan Mishra

    Good

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