कठिन पथ पे चलकर, फतह हासिल करने की
तू प्रतीक बन जा !
स्वमेहनत से कुछ ऐसा कर, सभी के मन की
तू मुरीद बन जा !
अनेक रंगों से सजे, संग- संग गुजारे
खट्टे- मीठे कयी भावों में पल बीते हमारे
बिखरती-संवरती, कभी चल-चल के ठहरती
चलते रहे निरन्तर एक-दूजे के सहारे
बस ख्वाहिश है इतनी,नित नव कीर्तिमान गढते
निडर, निर्भिक, अनवरत् आगे बढते
निराशाओं के भंवर में भी पुरउम्मीद बन जा !
कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की
तू प्रतीक बन जा !
जिसकी चाहत भी न की हो, वह सब हासिल हो तुमको
मनचाहा वह वर मिले, तेरी खुशी की बस चाहत हो जिनको
जिनकी हर ख्वाहिश को पूर्ण करने वाली मनभावन
तू कल्पवृक्ष बन जा !
कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की
तू प्रतीक बन जा !
प्रतीक बन जा
Comments
15 responses to “प्रतीक बन जा”
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बहुत सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद
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वाह वाह बहुत खूब, बेहतरीन कविता
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बहुत बहुत धन्यवाद
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👌✍✍🙏
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बेहतरीन
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत सुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद
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वेरी नाइस
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद
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बहुत सुंदर
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