प्रतीक बन जा

कठिन पथ पे चलकर, फतह हासिल करने की
तू प्रतीक बन जा !
स्वमेहनत से कुछ ऐसा कर, सभी के मन की
तू मुरीद बन जा !
अनेक रंगों से सजे, संग- संग गुजारे
खट्टे- मीठे कयी भावों में पल बीते हमारे
बिखरती-संवरती, कभी चल-चल के ठहरती
चलते रहे निरन्तर एक-दूजे के सहारे
बस ख्वाहिश है इतनी,नित नव कीर्तिमान गढते
निडर, निर्भिक, अनवरत् आगे बढते
निराशाओं के भंवर में भी पुरउम्मीद बन जा !
कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की
तू प्रतीक बन जा !
जिसकी चाहत भी न की हो, वह सब हासिल हो तुमको
मनचाहा वह वर मिले, तेरी खुशी की बस चाहत हो जिनको
जिनकी हर ख्वाहिश को पूर्ण करने वाली मनभावन
तू कल्पवृक्ष बन जा !
कठिन पथ पर चलकर, फ़तह हासिल करने की
तू प्रतीक बन जा !

Comments

15 responses to “प्रतीक बन जा”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत सुंदर

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. वाह वाह बहुत खूब, बेहतरीन कविता

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Prayag Dharmani

    बेहतरीन

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  4. Geeta kumari

    बहुत सुंदर

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. वेरी नाइस

    1. Suman Kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद

  6. Suman Kumari

    बहुत बहुत धन्यवाद

Leave a Reply

New Report

Close