एक व्यक्ति की व्यथा
————————–
बिखरे टूटे सपने लेकर ,
सब कुछ खोकर बिखरा सा था। अनमना,अजनबी, बेजान सा था, अंदर से शायद मृत सा था,
फिर से जीवन शायद सपना था। जो अपने थे जग छोड़ चले ,
कोई कहीं दबा को कोई बहता गया।
मन पर सौ मन का पत्थर था, बस अवाक मैं देखता रह गया। आंखों से झर झर झड़ी बहे ,
दिल में दुखों का सैलाब से था। एक तूफा मेरे अंदर था ,
एक तूफा बाहर नाच रहा।
जो जीवन भर की पूंजी थी ,वह सब तूफान मेंस्वाहा थी।
मेरे नन्हो,मुन्नों की तो बस,
इस भयावह में चीखे थी।
मेरी आत्मा को झकझोर गया, वह तूफ़ानों का रेला था। फिर कभी ना हो फिर कभी ना हो । वो ऐसा भयानक रेला था ,
वो ऐसा भयानक रेला था ।
निमिषा सिंघल
प्राकृतिक आपदा
Comments
12 responses to “प्राकृतिक आपदा”
-

Nice
-

Thanks
-
-

Thanks
-

Nice one
-

😀😀
-
-

अच्छा है
-

मार्मिक चित्रण
-

😀😀
-
-

बहुत खूब
-

😀😀
-

😀😀
-
-

Good
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.