दिन अगर बदल सकते
पुनः अपने बचपन में लौट पाते ।
फिर से पापा की नन्हीं परी बन
चार पैसे की नेमचुस खरीद लाते।
घर की चौखट पे बैठे,
बाट देखती चाचू की,
पटाखो के संग घरकुल्ला खरीद लाते।
धान के नेवारी तले, पिल्ले को रख
गभी उसकी भूख की चिंता
कभी ठंढ से बचाने का डर
भैया के संग मन से निकाल आते।
ना अपनों के
दूर जाने की फिक्र
मिले फिर वो लम्हा
जो हो दुनिया से इतर
पुनः विश्वास की ज्योत जगा पाते ।
अपनों का बदलना है भाता कहाँ
कुछ भी हो, वो हमसे दूर जाता कहाँ
कङवाहटे जिसने यह है घोली
दोष उसका नहीं जो बनती है भोली
यह टीस मिटा पाते कहाँ ।
बदल पाते
Comments
10 responses to “बदल पाते”
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बहुत खूब
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सादर धन्यवाद
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अति सुन्दर रचना
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सादर धन्यवाद
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सुंदर अभिव्यक्ति
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सादर धन्यवाद धन्यवाद
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बहुत खूब
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सादर धन्यवाद
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काश !!!
बहुत लाजवाब-

सादर धन्यवाद
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