तपती धरती पर पड़े, जब बरखा की फुहार,
सोंधी सुगन्ध से महके धरती, ठंडी चले बयार।
मयूर नाचे झूम – झूम कर, बुलबुल राग सुनाए,
तितली प्यारी आए सैर को, कोयल कुहू – कुहू गाए।
मधुकर की मीठी गुंजन है, पपीहा गाए राग – मल्हार,
तपती धरती पर पड़े जब बरखा की फुहार…..
बरखा की फुहार
Comments
16 responses to “बरखा की फुहार”
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Nice
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Thanks
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Sunder
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका 🙏🙏
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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धन्यवाद जी 🙏
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सोंधी सुगन्ध से महके धरती, ठंडी चले बयार।
यह विलक्षण काव्य प्रतिभा सदैव ही बनी रहे। बिंदास होकर लेखनी आगे बढ़े।
वाह वाह, बहुत खूब-
बहुत सारा धन्यवाद आपका सतीश जी 🙏 इतनी सुंदर समीक्षा के लिए बहुत बहुत आभार। आपकी समीक्षाओं से बहुत उत्साह मिलता है।
आप बहुत सुंदर समीक्षा करते हैं।-
आपकी लेखनी है ही काबिलेतारीफ
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🙏🙏
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वाह जी, लेखनी में बहुत क्षमता है
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सादर धन्यवाद सर बहुत बहुत आभार 🙏
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बहुत खूब
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शुक्रिया कमला मैम 🙏
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बहुत खूब
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शुक्रिया पीयूष जी 🙏
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