बाकी चिर निद्रा है

कुछ देर पहले तक
बातें कर रहे थे वे,
कुछ ही पल बाद,
उखड़ गई सांसें।
हल्की सी उल्टी,
का बहाना था,
गायब हो गई धड़कन।
शून्य शून्य शून्य
शून्य में विलीन हो गए।
यही है जीवन,
विलीन हो जाता है।
जब तक सांस है
तब तक ही सब है।
बाकी चिर निद्रा है।

Comments

15 responses to “बाकी चिर निद्रा है”

  1. Geeta kumari

    मार्मिक रचना

    1. सादर धन्यवाद, सादर नमस्कार

  2. Prayag Dharmani

    जीवन का सत्य

    1. सादर धन्यवाद जी

  3. अत्यंत मार्मिक

    1. सादर अभिवादन जी

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही मार्मिक, जीवन का सत्य यही है कि ये संसार नश्वर हैं

    1. सादर धन्यवाद जी,

  5. Piyush Joshi

    बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      Thanks

  6. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर

  7. Devi Kamla

    बहुत खूब, वाह

    1. Satish Pandey

      Thank you

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