बेख़बर

जनवरी से दिसंबर गुजर गए,
उस बेख़बर को खबर ही नहीं।
उसे क्या पता इश्क़ करने वाला
कोई आशिक़ ज़िंदा है भी या नहीं।।

Comments

6 responses to “बेख़बर”

  1. आपकी शायरी में अंतर्निहित मर्म विरह वेदना को सामने लाने में समर्थ है। श्रृंगार के वियोग पक्ष को प्रकट करती यह शायरी बहुत सुंदर है।

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar

    विरह वेदना को प्रकट करती सुन्दर पंक्तियां

  3. Geeta kumari

    बहुत ख़ूब।, सुंदर प्रस्तुति

  4. बहुत खूबसूरत

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