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    1. मेरा भी यही ख्याल था पंडित जी। लेकिन इस कहानी में नारी प्रधान को प्रथम स्थान दिया है मैने । कहानी की शुरुआत पुरुष से होती है और अंत नारी ही करती हैं।अगर इस कहानी में पुरुष के स्थान मिलता तो उधर माँ की दर्द के भाव कम जाता। कहानी के अंत हमे नारी से ही करनी थी। सुंदर समीक्षा के लिए धन्यवाद।

  1. आपकी कहानी का शीर्षक
    अति उत्तम है उसमें कोई दोष ही नहीं है…
    क्योंकि आपकी कहानी प्रज्ञा के ही इर्दगिर्द घूमती है एवं वही कहानी की नायिका व उत्तम चरित्र है जो समाज को अच्छी सोंच प्रदान करती है जिसका आचरण अनुकरण योग्य है..
    अभिषेक का पूरी कहानी में गौण स्थान है परंतु वह मानवता दिखाता है और अनुकरण योग्य है…

    1. मैने अपनी कहानी के शीर्षक प्रज्ञा बहुत ही सोच समझ कर रखा है क्योंकि यह कहानी नारी प्रधान है पहले यह ख्याल आया कि ममता रखें। फिर ऐसा लगा कि यह शीर्षक पुरानी हो गयी है। इस शीर्षक पर कई कहानीकार अपनी रचनाएं लिख चूके है। इसलिए मैने प अक्षर से शीर्षक खोज रहा था। अचानक ज़ुबान पर “प्रज्ञा”शब्द आ गया।

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