लघुकथा

मौकापरस्त मोहरे

वह तो रोज़ की तरह ही नींद से जागा था, लेकिन देखा कि उसके द्वारा रात में बिछाये गए शतरंज के सारे मोहरे सवेरे उजाला होते ही अपने आप चल रहे हैं, उन सभी की चाल भी बदल गयी थी, घोड़ा तिरछा चल रहा था, हाथी और ऊंट आपस में स्थान बदल रहे थे, वज़ीर रेंग रहा था, बादशाह ने प्यादे का मुखौटा लगा लिया था और प्यादे अलग अलग वर्गों में बिखर रहे थे। वह चिल्लाया, “तुम सब मेरे मोहरे हो, ये बिसात मैनें बिछाई है, तुम ... »

चिट्ठी

प्यारी गौरैया! आज तुम्हें इतने दिनों बाद अपनी छत पर देख अपने बचपन के दिन याद आ गए ,तब तुम संख्या में हमसे बहुत ज्यादा थीं, आज हम हैं ज्यादा नहीं पर कुछ पेड़ हैं लेकिन तुम सब अब पता नहीं कहां चली गईं। शायद हमारे घरों ने तुम्हारे घर छीन लिए लेकिन सच कहूं गौरैया! जब हमारा नया घर बना था तो तुम्हारी याद ही नहीं आयी , आज जो आंसू आए वो शायद उस समय आते तो कुछ करती मैं तुम्हारे लिए क्योंकि, मुझे याद है जब ... »

दोस्ती से ज्यादा

hello friends, कहने को तो प्रतिलिपि पर ये दूसरी कहानी है मेरी लेकिन सही मायनो मे ये मेरी पहली कहानी है क्योकि ये मेरे दिल के बहुत करीब है चलिये आपका ज्यादा वक्त जाया नी करते और कहानी शुरू करते है        आज मै बहुत खुश हू और वजह भी जायज है यार आखिर इतने वक्त बाद घर वापिस जो जा रही हू  5 साल बाद अपने देश India वापिस जा रही हू, हाँ क्यों India मेरा घर नही हो सकता क्या मेरे लिए तो India ही मेरा पहला घ... »

मिनी पेट्रोल पंप

मिनी पैट्रोल पम्प समर अपनी नयी बाइक से फर्राटे भरते हुये घर से निकला।वह अपनी किराने की दुकान का सामान लेने लालपुर जा रहा था।रास्ते मे उसकी बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया।वहाँ कोई पैट्रोल पम्प नही था।पूछने पर पता चला कि यही धरमपुर मे गुप्ता जी के वहाँ पैट्रोल मिल जाता है। फिर क्या था?समर अपनी बाइक घसीटता हुआ पहुँचा और आवाज लगायी,गुप्ता जी!पैट्रोल दे देना। तभी गुप्ता जी की लड़की मिनी आयी और समर से बोली,... »

“काशी से कश्मीर तक सद्भावना यात्रा सन1994”

“काशी से कश्मीर तक सद्भावना यात्रा सन1994” किसी भी यात्रा का उद्देश्य सिर्फ मौजमस्ती व् पिकनिक मनाना ही नहीं होता | यात्राएं इसलिए की जाती हैं कि हम एक-दुसरे की सभ्यता ,संस्कृति,रहन सहन व् विचारों को जान सकें ,करीब से देख   अच्छाई ग्रहण  सकें तथा अपनी संस्कृति सभ्यता से प्रभावित कर सकें | अखिल – भारतीय सद्भावना संगठन द्वारा आयोजित गाठ छ: अगस्त से बाइस अगस्त तक ‘काशी से कश्म... »

गांव की बेटी

दिन की शुरुआत अंगीठी के उठते धुएं से शुरू होती पकाती परिवार के लिए रोटी फिर भी सुने समाज की खरी-खोटी थक जाए कितना भी तू फिर भी आराम ना लेती देख तुझे मैं यही कहती कैसे यह सब है करती मेरे गांव की तू बेटी. मीलो चलती पानी भरकर लाती रख घड़ा जमी पर फिर से दोपहर का खाना बनाती रख गमछे में प्याज और चार रोटी फिर से खेत की तरफ रवाना होती खिलाकर रोटी पिलाकर पानी पति की प्यास बुझाती ले हसिया हाथ में कटाई में ल... »

बच्चा

एक बच्चा,अपने मन से कुछ बनना चाहता था पर मां-बाप की ही उस पर चलती रही. जैसा हम कहते हैं वैसा ही करो और उसकी इच्छाएं है यूहीं आग में जलती रही. ख्वाब टूट गए उसके तो हकीकत में क्या जिएगा यही सोच उसके दिल और दिमाग में चलती रही. ख्वाब उसके टूट चुके थे रिवायत ये बचपन से ही चलती रही. वह तो कई साल पहले ही मर गया था पर लाश पचपन तक चलती रही. »

सच्चाई

मुंह में राम बगल में छुरा लिए आते हो अपनी गंदी राजनीति से सबको लड़वाते हो क्या फर्क पड़ता है कि तुम हिंदू हो या मुसलमान अपने उन्ही मेले हाथों से शांति के कबूतर उड़ाते हो अल्लाह के बंदे, भगवान की रचना है हम क्यों अयोध्या को आधा-आधा कटवाते हो अगर सच्चे इंसान हैं हम तो फिर क्यों तुम घबराते हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम नमाज पढ़ते हो या फिर दिए जलाते हो. »

सात चिड़ियों का बसेरा

एक बाग में था पेड़ हरियाणा विशालकाय, सुंदर, मतवाला बैठा हो जैसे साधना में तपस्वी कोई सम्पूर्ण, समृद विशाल हृदय वाला. जागृत हो जाता होते ही सवेरा जिस पर था सुंदर साथ चिड़ियों का बसेरा खाकर फल उसके चिड़ियों ने बीजों को जग में जा बखेरा. किसी चिड़िया का पहली डाल पर बसेरा किसी का था ऊंची अटारी पर डेरा सुंदर चिड़ियों का परिवार बढा पेड़ दिखने लगा और भी घनेरा. बीत गए कई साल खुशी से उड़कर आकर बैठती बस उसी ... »

हैप्पी बर्थडे सांध्या

इतने सालो से अपने कंधो पे जिम्मेदारी माँ की ले रखी है माँ की तू बेटी है घर की तू तरक्की है अनपढ़ माँ की अब तू इकलौती कलम और तख्ती है किस तरहा सुधर गया जीवन दुनिया हक्की बक्की है. जो तेरे कर्म मे था परिश्रम तूने गहन किया कई मुश्किलें सर आन पड़ी सभी को तूने सहन किया गरीबी मे साथ दिया माँ का फटे कपड़ो को भी पहन लिया छोड़ना ना कभी जो माँ का हाथ थाम लिया आज के दिन तूने जन्म लिया हैप्पी बर्थडे मेरी बहन संध्... »

दलित

इस आजाद भारत में आज भी मेरी वही दशा है. छुआ – छूत का फंदा आज भी मेरे गले में यूहीं फंसा है. मै हूँ दलित गरीब भेदभाव का शिकंजा मेरे पैरो में कसा है. मै तिल तिल कर जी रहा समाज मेरे बुरे हाल पर हंस रहा है. ये मत भूलो, जिस घर में तुम हो रहते वो मेरी दिहाड़ी मजदूरी से ही बना है. फसल उपजाऊ सबकी भूख मिटाऊँ पर खुद भूख से मै ही लड़ता हूँ. साथ चलने का हक़ भी मै ना पाऊं पर सबके उठने से पहले सड़के साफ मै ही... »

उद्धव गोपी सम्वाद

उद्धव गोपी सम्वाद

उद्धव जी कहते हैं गोपियों से । परमेश्वर को पहचानो , सत्य उसे ही जानो । क्यों रोती उसके लिए ,ये रोना छोड़ो और मेरी बात मानो। जो आधार है जगत का वो आधार को पहचानो। गोपी ने कहा उद्धव जी से कहा तुम तो ज्ञानी हो हमारा दर्द क्या जानो । तुम ये ज्ञान छोड़ो भी हमारा प्रेम पहचानो। बेदर्दी हो तुम विरह की पीर क्या जानो । मानो उस कान्ह को उसे ही प्रीतम मानो । »

उद्धव गोपी सम्वाद

उद्धव गोपी सम्वाद

उद्धव जी कहते हैं गोपियों से । परमेश्वर को पहचानो , सत्य उसे ही जानो । क्यों रोती उसके लिए ,ये रोना छोड़ो और मेरी बात मानो। जो आधार है जगत का वो आधार को पहचानो। गोपी ने कहा उद्धव जी से कहा तुम तो ज्ञानी हो हमारा दर्द क्या जानो । तुम ये ज्ञान छोड़ो भी हमारा प्रेम पहचानो। बेदर्दी हो तुम विरह की पीर क्या जानो । मानो उस कान्ह को उसे ही प्रीतम मानो । »

गाँव की एक रात

काली आधी रात में, दुनिया देख रही थी सपने | आलस का आलम था चहु ओर रात भी लग रही थी ऊंघने | तब मैंने छत से देखा, बतखो के झुण्ड को तलाब में | ठंडी हवा भी चलने लगी, रात के आखरी पहर मे | मछलिया खूब उछाल रही थी, फड़ फाड़ा रही थी इधर उधर | सोचा हाथ लगाउ उनको, पर ना जाने गई किधर | तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान में, बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति में | जैसे वो सब मस्त है आजादी में, मैंने भी आजादी महसूस की उन सबकी ... »

ठंड

******** ठंड******** ठंडी का मौसम था और चीनू की बीमार माॅ मुंबई जाने वाली थी दवा कराने के लिए चीनू बडे सुबह ही उठ कर घर का सारा काम निपटा कर नहा कर पतले कपडे डाल लेता है ।धुप अच्छी निकली रहती है वह पतले कपडे पहने ही अपने माँ को बस स्टेशन छोडने के लिए जौनपुर बस डिपो गया । वहा चीनू अपने माँ का हाल देखकर अपने माँ को वाराणसी स्टेशन से ट्रेन पकडाने का निर्णय कर निकल जाता है। और वहा पहुंच कर अपने माँ को... »

लघुकथा

आत्मकथा दोस्तो मैं बहुत गरिब परिवार से रह चुका हूॅ बात उस समय की है जब मै क्लास सेकेंड में पढता था ।उस समय मुझे बडी ही मुश्किल से किताब और कलम के पैसे मिलते थे ।उस समय घर पर मैं कलम खरिदने के लिए पैसे मांगे तो मुझे नही मिला मेरी माँ बोली बेटा एक दो दिन चलाओ इसके बाद दिला दुगी । मैं दुसरे दिन स्कूल चला गया और बिना होम वर्क किये स्कूल में मेरा पीटाई हुआ ।और मैं घर आकर बोला मैं कल स्कूल नही जाऊंगा । ... »

मेरा राजा बेटा

खुशियों का एहसास लाया, जब तू मेरी जिंदगी मे आया छू ना पाए तुझे मुश्किलों का साया, बीड़ा मैंने यही उठाया. दुख तुझपर कोई ना आए, इसी जिद्द पर मै अडी हूँ जब तू खुद को निराश पाए, हमेशा साय की तरहा, ” तेरे पीछे ही मै खड़ी हूँ ” खून का रिश्ता तुझसे गहरा और पक्का है, तुझपर है भरोसा एक तू ही लगता मुझको सच्चा है, बार-बार कहती यही “मेरा राजा बेटा सबसे अच्छा है, तू कितना भी बड़ा हो जाये “... »

लघुकथा

( लघुकथा ) एक गरीब महिला अपने परिवार के साथ एक टुटी झोपड़ी में रहती थी उसके परिवार में एक बेटी और एक बेटा था | उसकी माँ पास के गॉव में जाकर झाडू पोछा करके कुछ खाने कि चीजे लाती थी उसमें भी खाना सिर्फ दो लोगो को होता कभी माँ भूखी सो जाती थी तो कभी बेटा यह बोलकर सो जाता था कि माँ आज मुझे बिल्कुल भूख नहीं हैं | जैसे तैसे गरीब महिला का घर चल रहा था एक दिन रात को बहुत ही भयंकर ऑधी तूफान आया उसमें गरीब ... »