जीवन की आड़ी-सीधी रेखाएं
बनती और बिगड़ती रहती हैं…
देख के कर्मों की गति ये
कभी हँसतीं तो कभी रुवासी रहती हैं…
पथ पर अपने चलने को आतुर
रहती हैं
समय की गति से सौदेबाजी करती रहती हैं…
जीवन की आड़ी-सीधी रेखाएं
बनती और बिगड़ती रहती हैं….
जीवन की आड़ी-सीधी रेखाएं
Comments
5 responses to “जीवन की आड़ी-सीधी रेखाएं”
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बहुत ही सुन्दर भाव में आपकी कविता सजती है।
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सुन्दर
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अतिसुंदर भाव
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बहुत ही सुन्दर भाव है।
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बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
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