कोपलें फूटी अनेकों
पेड़ बन पाये नहीं,
झाड़ियां उग आई मन में
बेर लग पाये नहीं ।
स्वाद था मीठा सभी में
जीभ में परतें जमीं थी
इसलिए मीठी नजर
महसूस कर पाये नहीं।
इस तरह हम खुद ही खुद में
स्वाद ले पाये नहीं,
उलझनों में घिरते- घिरते
पेड़ बन पाए नहीं।
बेर लग पाये नहीं
Comments
11 responses to “बेर लग पाये नहीं”
-
लाजवाब
-
बहुत बहुत धन्यवाद
-
-
बहुत सुंदर
-
अतिसुन्दर टिप्पणी हेतु सादर अभिवादन, सादर धन्यवाद
-
-
अलग खयाल के साथ सुंदर रचना
-
बहुत सारा धन्यवाद जी
-
-
Sunder
-
सादर अभिवादन और धन्यवाद शास्त्री जी
-
-

लक्षणा शक्ति का सुन्दर प्रयोग , बेहतरीन
-
सुन्दर समीक्षा हेतु सादर धन्यवाद सर जी
-
-

बहुत खूब
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.