भारती की अथहा पीड़ा

क्षणभर में क्षीण हो
छलकी आंख भारत मां की
जब मजदूरों के छाले
सीने में लेकर बैठ गई
निज संतान का दर्द दिखा तो
ऐसी दर्द की आह,,,,, भरे
जैसे लोह पथ गामिनी
सीने के छाले रौंद गई
कटी छिली हाथों की लकीरें
एक संघर्ष सुनाती हैं
सूरज के ताप से जलती गोद मेरी
उनके कदम जलाती है
निराशा से ग्रस्त नयन
आस को निहारते
कहीं दिख जाए कोई
जल भोज बाटते
महामारी ने मुंह बांधा तो
मार भूख की बड़ी लगे
पेट पे कपड़ा बांध लिया
आंसू की भी एक लड़ी लगे
अथाह दर्द समेटे थी वो
मेदनी अपनी गोदी में
कृतहन बना जो समाज दिखा तो
रक्त के आंसू रोती है
कितने वर्ष से दबा हुआ वो
तारतम्य दुख के नीचे
सुख छाया निवासी क्या जाने
की कैसी पीड़ा होती है
आखिर किन शब्दों में कहूं मैं
अपनी लहू की पीड़ा को
भूख से बच्चे बिलख रहे
ये भूली अपनी क्रीड़ा को
यमराज के सामने खड़ी हुई
कहे रोक ले इस मनमर्जी को
तुझे अपना -अपना सूझ रहा
मैं जानू तेरी खुदगर्जी को
जाने कितने घरों से बली लिए
नहीं भर्ती मौत की क्या मटकी
नित- नित मेरी कोख उजाड़ रहा
तू आया क्यों है रे कपटी

Comments

17 responses to “भारती की अथहा पीड़ा”

  1. himanshu ojha

    Nice😀

  2. Priya Choudhary

    Thankyou

  3. Priya Choudhary

    🙏🙏🙏

  4. Priya Choudhary

    Thanks 🙏

    1. Priya Choudhary

      Thanks

  5. Priya Choudhary

    🙏🙏

  6. Anita Sharma

    Sundar

    1. Priya Choudhary

      Thankyou

  7. Satish Pandey

    Baut Khoob

    1. Priya Choudhary

      Thankyou

  8. Pratima chaudhary

    बहुत ही मार्मिक व असरदार
    मजदूरों के साथ क्या-क्या सितम हुए
    उनका बहुत ही मार्मिक चित्रण

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