भावों की जननी हिंदी है,
मां है अपने धाम की।
कोरोना काल में हाय, हैलो, छूटा ,
जय हुई अपने प्रणाम की ।
हिंदी में अपने भाव रचे ,
हिंदी ही अधरों पर सजे ।
हिंदी में खेला बचपन सारा
खेले, कूदे और बढ़े,
युवा होकर हिंदी में ही,
प्रेम प्रीत के पाठ पढ़े ।
हिंदी से समझा भावों को,
हिंदी ने धोया घावों को,
हिंदी माथे की बिंदी है ,
जो भारत की पहचान बनी,
हिंदी से सब सुखी हुए हम,
हिंदी है हिंदुस्तान की वंदनी
भावों की जननी है हिन्दी
Comments
16 responses to “भावों की जननी है हिन्दी”
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जय हिंद जय हिन्दी
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धन्यवाद भाई जी ।
हिंदी दिवस की बहुत बहुत बधाई
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हिंदी माथे की बिंदी है ,
जो भारत की पहचान बनी,
बहुत ही बिंदास तरीके से मातृभाषा हिंदी पर कविता प्रस्तुत की है। बहुत खूब, बहुत सुंदर। हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामना-
ख़ूबसूरत समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी🙏
आपको भी हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।
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बहुत अच्छी कविता
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बहुत शुक्रिया जी 🙏
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True
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Thanks dear pragya
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अतिसुंदर
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बहुत बहुत धन्यवाद प्रतिमा जी
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Very Nice Poem
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बहुत बहुत धन्यवाद सर सादर आभार 🙏
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वाह वाह
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धन्यवाद जी 🙏
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waah waah, bahut sundar
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बहुत बहुत धन्यवाद आपका इंदु जी🙏
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