भीगी भीगी रातों में

भीगी भीगी रातों में जब याद तुम्हारी आती है
सच कहता हूं यार मेरे ये आंखें जल बरसाती हैं
कैसे कह दूं दोस्त मेरे की मुझको तुमसे प्यार नहीं
प्यार असीमित है तुमसे ,इसमें कोई इनकार नहीं
व्यथित हृदय कुंठित होकर बस , तेरा नाम बुलाता है
सिवा तेरे इस नाजुक दिल को नहीं और कुछ भाता है।
रात रात भर रोता हूं बस तेरी याद सताती है
सच कहता हूं यार मेरे ये …………………….
सोच था की फूल खिलेगा मेरे दिल की धरती पर
किन्तु उगा है नागफनी अब मेरे दिल की परती पर
अपने इस छोटे दिल में कुछ पीर छुपाए बैठा हूं
इन आंखों को देख असीमित नीर छुपाए बैठा हूं
कैसे तुझे बताऊं कि तू कितना मुझे रुलाती है
रात रात भर रोता हूं बस तेरी याद सताती है
सच कहता हूं यार मेरे ये………………………..
Shakti Tripathi DEV

Comments

4 responses to “भीगी भीगी रातों में”

  1. Pragya Shukla

    अति सुन्दर रचना

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