बारिश बहुत है बाहर
भीतर पड़ा है सूखा,
खाता हूँ खूब चींजें
फिर भी रहा हूँ भूखा।
मन में उमड़ के बादल
नैनों में खूब बरसा,
चाहत हुई थी शायद
ऐसा हुआ है शक सा।
भीतर पड़ा है सूखा
Comments
4 responses to “भीतर पड़ा है सूखा”
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बहुत खूब
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वाह वाह क्या बात है
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अति उत्तम चित्रण किया है आपने।
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भावों का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत करती हुई सुन्दर रचना
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