भूख यह क्यों रोज लगती है मुझे

ठंड में ये भूख भी
ज्यादा सताती है,
है नहीं चर्बी मगर
हड्डी हिलाती है।
भाग पहुँचा रोज खाता हूँ
मगर ये भूख भी
लौट कर फिर से
मेरा मन कुलबुलाती है।
सोचता हूँ हम गरीबों को
भला ये ठंड भी,
किसलिए इतना सताती है
रुलाती है।
ठंड में कुछ काम-धंधा है नहीं,
पांच-छः दिन बाद में
कुछ काम मिलता है कहीं।
फिर मुई सी भूख यह
क्यों रोज लगती है मुझे,
क्यों रहम करती नहीं
क्यों तोड़ती है यह मुझे।

Comments

8 responses to “भूख यह क्यों रोज लगती है मुझे”

  1. बहुत ही बढ़िया

    1. Satish Pandey

      बहुत आभार

  2. Geeta kumari

    निर्धन व्यक्ति की सर्दी में क्या हालत होती है उस का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई बहुत सुंदर कविता

    1. Satish Pandey

      समीक्षागत टिप्पणी हेतु हार्दिक आभार

    1. Satish Pandey

      आभार

  3. बहुत ही अच्छी कविता

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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