*मंज़िल की ओर*

जब कदम उठे मंज़िल की ओर,
महकने लगी दिशाएं चहुं ओर
आशीष मिले हैं अपनों से,
कानों में गूंजा विजय श्री का शोर
वर्षों की मेहनत रंग लाई,
उल्लास के क्षण संग लाई
अब ना रुकना राही,
होने वाली है मन चाही
प्रभु का भी तेरे सिर हाथ है,
फ़िर डरने वाली क्या बात है
_______✍️गीता

Comments

11 responses to “*मंज़िल की ओर*”

  1. Virendra sen Avatar

    वर्षो की कठिन मेहनत के बाद मिलने वाले फल के उत्साह में डूबी खूबसूरत अभिव्यक्ति

    1. बहुत-बहुत आभार सर

  2. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    बहुत खूब inspirational

    1. बहुत-बहुत आभार सर

  3. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    “जब ईश्वर का साथ हो तो वास्तव में डरने की क्या बात है ” आपने बहुत ही अच्छा और शानदार लिखा है

    1. समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद संदीप जी

  4. बहुत ही खूब और सत्य से सराबोर रचना

    1. समीक्षा हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रज्ञा जी

    1. समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

  5. Seema Chaudhary

    मेहनत का फल मिलने की खुशी दर्शाती हुई बहुत सुंदर और प्रेरक कविता

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