हमें बस जीवंत बोध की दरकार है
नहीं मुझे खुद पर, हाँ तुझपर एतवार है
हम सजग प्राणी भले हैं
पर स्वार्थ से सना अपना प्यार है ।
स्वार्थ से रचा-बसा राब्ता
यह बस नाम है अनुराग का
राफ्ता-राफ्ता उधङती गयी धज्जियां
अवशेष खुद का अहंकार है ।
तादम्यता का दामन थाम के
समझौते के बल पर जो बसा
स्नेह का नामो-निशान नहीं
डर-डर के रहे फिर भी टकरार है ।
हर क़दम को फूक -फूक कर रखा
बढने से पहले खुद से कहा
कबतक यूँ सहते रहोगे
ले डूबा वही समझा जिसे
मझधार है ।
मझधार
Comments
8 responses to “मझधार”
-

बहुत बहुत उम्दा
पंक्तियां और लय के साथ सुंदर शब्दावली-

सादर आभार
-
-
सुंदर
-

सादर आभार
-
-
सुन्दर अभिव्यक्ति
-

सादर आभार
-
-
उम्दा प्रस्तुति
-

सादर धन्यवाद
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.