मन।

मन।

क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन?

तुझे काया मिली
इतनी माया मिली,
तेरी राहों में बिखरा है मधुवन।
क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन।

इतना सुन्दर- सा घर
यानों का सफर,
तू भिखारी से राजा गया बन।
क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन।

तुझे सपने मिले
संग अपने मिले,
तेरी आभा से चमके हैं कण-कण।
क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन।

पदोन्नति मिली
लाल बत्ती मिली,
आज लाखों करें पुष्प अर्पण।
क्यों घुट – घुट के जीता है रे मन।

अनिल मिश्र प्रहरी।

Comments

13 responses to “मन।”

  1. Kanchan Dwivedi

    Good

    1. Anil Mishra Prahari

      Thanks.

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुन्दर

    1. Anil Mishra Prahari

      धन्यवाद।

    1. Anil Mishra Prahari

      Thanks.

    1. Anil Mishra Prahari

      Thanks.

    1. Anil Mishra Prahari

      Thanks.

    1. Anil Mishra Prahari

      Thanks.

      1. वेलकम

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