मन उड़ान तेरी

मन उड़ान तेरी
पंखों बिना चलती रही,
उस तरफ फिर इस तरफ
सब तरफ बहती रही।
चैन आया हो कहीं
ऐसा नहीं संभव हुआ,
एक स्थल पर न टिक पाया
फिरा विस्मित हुआ।
आज मीठा रास आया
और कल भाया नहीं
फिर नमक की चाह आई
तृप्त हो पाया नहीं।
जिन्दगी भर दौड़ चलती ही रही
उलझाव की,
जिंदगी का कब समय बीता
समझ पाया नहीं।

Comments

10 responses to “मन उड़ान तेरी”

    1. Satish Pandey

      Thank you

  1. Virendra sen Avatar

    अति सुंदर

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. उम्दा लेखन व लयात्मकता

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत आभार

  3. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

    1. Satish Pandey

      सादर आभार

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