राशिफल पढ़ते रहे हम उम्र भर
खुद ब खुद कुछ भी नहीं हो पाया है,
जो मिला मेहनत का फल था दोस्तो !!
बिन किये कुछ भी नहीं हो पाया है।
मन की आशाएँ धरी ही रह गईं,
जिस तरफ प्रयास हो पाया नहीं,
कर्म के फल से अधिक देना कभी
भाग्य की रेखा को भाया ही नहीं।
दे स्वयं की भावना को नेक स्वर
चार शब्दों को किया अंकित सदा
गम उठा लिपिबद्ध करते ही रहे
दूसरे का गीत गाया ही नहीं।
मन की आशाएँ
Comments
8 responses to “मन की आशाएँ”
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बहुत सुंदर रचना
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जो मिला मेहनत का फल था दोस्तो !!
बिन किये कुछ भी नहीं हो पाया है।
_______ मेहनत और कर्म करने की ओर प्रेरित करती हुई कवि सतीश जी एक उत्कृष्ट रचना।भाग्य के भरोसे ही ना बैठने की सुंदर सीख देती हुई बहुत ही उम्दा प्रस्तुति, उत्तम लेखन। -

बहुत शानदार कविता
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सही कहा
भाग्य में भी तभी होता है जब प्रयास किया हो -

बहुत लाजवाब
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JAY ram JEE ki
अतिसुंदर -
अतिसुंदर
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बहुत ही उत्प्रेरक रचना
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