मन तुम्हारा हो गया…****

मन तुम्हारा हो गया
यह तन तुम्हारा हो गया
मन की पर्तों में जो गहरे
दर्द बोये थे कभी
तेरा निश्छल प्रेम उन
जख्मों का मरहम हो गया….
तुम धूप-सी लगती रही
मैं नीर-सा बहता रहा
टहनियों की लचक-सी
कोमल तुम्हारी कमर थी
स्वप्न में मैं उस कमर पर
बर्फ-सा पिघलता रहा
मन तुम्हारा हो गया
यह तन तुम्हारा हो गया….

देह की लाली जो देखी
व्याकरण गढ़ने लगा
केतु की आँखों में मुझको
हाय! क्या दिखने लगा ????
मधुयामिनी में मैं प्रिये !
जुल्फों में तेरी उलझा रहा
रातभर कुछ ना कहा
सुबह फिर सोता रहा
तेरी जुल्फों से गिरे जब
मोती मेरे गालों पे
सदियों का प्यासा मैं जैसे
यूं उन्हें पीता रहा
मन तुम्हारा हो गया
यह तन तुम्हारा हो गया….

काव्यगत सौन्दर्य एवं विशेषताएं:-

यह कविता मैंने मन की गहराईयों से तथा
गेय पद के साथ माधुर्य में लिखी है
संयोग श्रृंगार रस का प्रयोग करते हुए
प्रेम में विलीन दो आत्माओं के मिलन में लिखी हैं….

Comments

6 responses to “मन तुम्हारा हो गया…****”

  1. Geeta kumari

    श्रृंगार रस से सराबोर बहुत सुंदर रचना

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