मन में नई उमंगें

मन में नई उमंगें
फिर से उमड़ रही हैं,
कालिमा की परतें
सचमुच उखड़ रही हैं।
दुविधाएं आज सारी
मिटकर सिमट रही हैं
बाधाएं आज सारी
पथ की निपट रही हैं।
मंजिल को चूमने को
आतुर हैं मन की लहरें
तूफान जैसी बनकर
तट पर मचल रही हैं।

Comments

5 responses to “मन में नई उमंगें”

  1. बहुत खूब सर

  2. Geeta kumari

    मंज़िल की ओर कदम बढ़ाने की चाहत दर्शाती हुई कवि सतीश जी की बहुत सुन्दर कविता है. सुन्दर भवाभिव्यक्ति और अति सुन्दर प्रस्तुति..

  3. बहुत ही लाजवाब कविता, वाह

  4. वाह जी बहुत खूब

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