महबूब

जूम गूगल मीट पे
क्लास चल रही है |
नेटवर्क भी सही नहीं,
फिर भी बात हो रही है|

मोर मोरनी बिछड़ गए,
राधा बन घर रो रही|
है गरीबी की मार से,
खुद फोन नहीं ले पा रही|

स्वाभिमान नहीं वह छोड़ रही,
प्रेमी से ना कुछ बोल रही|
अब गूगल जुम पर देख देख कर,
रो रो कर जीवन गुजार रही|

करके सिंगार सभी वह आती है,
प्रेमी को वह देख रही है|
हाय गरीबी हाय कोरोना,
खुद को वह धिक्कार रही है|

मन को वश में करके, .
करती खूब पढ़ाई है|
सबके लिए वह समय है देती,
प्रथम वरीयता पढ़ाई को देती है

Comments

5 responses to “महबूब”

  1. Geeta kumari

    गरीबों की व्यथा को समझती सुंदर रचना

  2. समसामयिक आधुनिकता भरी कविता

  3. बहुत सुंदर

  4. Praduman Amit

    रचना स्तरीय है

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