मां तूं दुनिया मेरी

हरदम शिकायत तूं मुझे माना करती कहां
निमकी-खोरमा छिपा के रखती कहां
भाई से‌ ही‌‌ स्नेह मन में तेरे
यहां रह के भी तूं रहती कहां।
जब भी कुछ बनाती,
आंखें छलक आती तेरी
गर इतनी ही फिकर है तुझे
भाई को क्यूं नहीं रखतीं यहा
यहां रहके भी तूं रहती कहां।
पास रहकर भी जन्मदिन मेरा भूल जाती है तूं
पेङा भाई के जन्मदिन पर बनाती है क्यूं
मुझसे तुझे नेह कहां,
मन बसता बस भाई ‌है जहां
यहां रहके भी तूं रहती कहां ।
यह तकरार मन में चलता रहा
भाई के प्रति मां का खिंचाव खलता रहा
पूछ न‌ पाई कभी मां से कोई सवाल
क्यूं ‌तेरी दुनिया है वो भाई रहते जहां
यहां रहके भी तूं रहती कहां ।
मेरे हर सवाल का जबाव मिला तभी
मां बनकर खुद ही को तौला ज़भी
पास जो है उसका हरपल आभास है
दूर जो है मन उसमें अटकता है वहां
यहां रहके भी तूं रहती कहां।
आज मेरा बेटा मुझसे ‌बहुत‌ दूर है
हर पल हर‌ क्षण तङपता, मन‌ मजबूर हैं
भोजन का पहला निवाला लेने से पहले
घूम आती मैं, रहता वो जहां
यहां रह के भी तूं रहती कहां।
आज मां के प्यार का अर्थ ‌समझ आया मुझे
हर चिंता जायज़ सबकी चिंता है तुझे
जो‌ दूर है कमजोर है तूं थामती उसी का छोर है
मां तू करूणामयी, हाथों में तेरी सबकी डोर है
हर बच्चे की जन्नत, तूं रहती जहां
कहीं भी रहो, पर हमेशा रहती यहां।

Comments

4 responses to “मां तूं दुनिया मेरी”

  1. Ekta

    मां तू करुणामयी, हाथों में तेरी सब की डोर है
    बहुत सुंदर

  2. मां तू दुनिया मेरी बहुत ही सुंदर विचार

  3. Amita

    मॉं तू करुणामयी, हाथों में तेरे सबकी डोर है,हर बच्चे की जन्नत तू ।।
    मां की ममता का बहुत सुंदर बखान🙏🏻🙏🏻

  4. अतिसुंदर भाव 

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