जरा कम ही शोर मचाया करो
क्योंकि मैंने अक्सर शोर मचाने वालों को
भीड़ का हिस्सा बनते देखा है
जिनका स्वयं का कोई
अस्तित्व नहीं होता है
सिर्फ दूसरों का अनुसरण करते हैं
खुद की होती नहीं कोई पहचान
दूसरों की परछाई बनते हैं
है तेज तुममें तो शोर मत मचाओ
जाओ घर से बाहर
मरती मानवता को बचाओ
जाकर देखो जरा
दुनियाँ की परेशानियों को
अपनी परेशानी छोटी नजर आएगी
जब लगेगी भूँख तो सूखी रोटी भी
स्वादिष्ट बन जाएगी
जैसा बनाकर देती हूँ
चुपचाप खा लो वरना
जाओ किसी हलवाई से ब्याह रचा लो…..
मानवता को बचाओ..
Comments
9 responses to “मानवता को बचाओ..”
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भविष्य में सर्वाधिक काम आने वाली कविता
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अतिसुंदर भाव
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Thanks
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वाह बहुत खूबसूरत
क्या बात कही आपने👌
सराहनीय कविता-

Thanks
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कवि प्रज्ञा जी की बेहद खूबसूरत कविता, सरल और बोधगम्य भाषा व शिल्प। बहुत खूब
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Thanks
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अति सुंदर भाव और सुंदर प्रस्तुति
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Thanks
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