आँख का जल एक है, मानव की पहचान,
अगर न हो संवेदना, फिर कैसा इंसान।
फिर कैसा इंसान, जानवर भी रोते हैं,
मानव में तो दया भाव के गुण होते हैं।
कहे कलम विचरते, हैं भू में प्राणी लाख,
दया की मूरत है, प्यारी मानव की आंख।
मानव की पहचान
Comments
8 responses to “मानव की पहचान”
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आँख का जल एक है, मानव की पहचान,
अगर न हो संवेदना, फिर कैसा इंसान।
_________ संवेदनशीलता ही मनुष्य का महत्वपूर्ण गुण है, इसी सत्य को परिलक्षित करती हुई कवि सतीश जी की छंद शैली में एक बेहतरीन रचना, अति उत्तम लेखन-
बहुत बहुत धन्यवाद
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इस लाजवाब समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद, अभिवादन
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बहुत खूब, अति उत्तम
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बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर
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सादर धन्यवाद
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बहुत सुंदर
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