मित्रपद विराजित हो

श्रीदरूप हो तुम,
मित्रपद विराजित हो
बस सदा ही खिलते रहो
मण्डली में शोभित हो।
श्रोतव्य है मीठी वाणी तुम्हारी
बिंदास चेहरे की मुस्कान न्यारी।
सदोदित रहें सारी खुशियाँ तुम्हारी,
सुस्मित रहे मन, दुख सब विलोपित हों।
संविग्न मत होना, संशय न रखना,
मित्रता निभाएंगे लोभ-मद रहित हो।

Comments

18 responses to “मित्रपद विराजित हो”

    1. बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी

    1. बहुत सारा धन्यवाद जी

    1. सादर धन्यवाद जी

    1. सादर नमस्कार जी

  1. बहुत ही सुंदर

    1. बहुत धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    बहुत ख़ूबसूरत रचना है मित्रता पर ।अतिसुंदर भावनाएं ।
    मित्रता पर इतनी अनूठी रचना आपकी विलक्षण प्रतिभा को दर्शाती है…लेखनी को प्रणाम ।🙏🙏

    1. बहुत ही सुंदर समीक्षा, आपको हार्दिक अभिवादन , इतनी सुंदर समीक्षा शक्ति को प्रणाम। धन्यवाद गीता जी

  3. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद सुमन जी

  4. बहुत खूब पाण्डेय जी

    1. Satish Pandey

      सादर नमस्कार

  5. MS Lohaghat

    बहुत ही बढ़िया

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

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