आपने जब हमें
मित्र अपना कह दिया
यकीन मानिए,
जलवा हमारा बढ़ गया।
अब ये माथा आपका
झुकने न देंगे हम कभी
आपको सिर-माथ पर
हमने सजा कर रख लिया।
मित्र अपना कह दिया
Comments
16 responses to “मित्र अपना कह दिया”
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सादर धन्यवाद
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सुन्दर
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धन्यवाद जी
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बहुत खूब
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Thank you
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वाह सर, मित्र की शान में इतनी सुन्दर और अनूठी रचना…
कवि श्रेष्ठ की श्रेष्ठ लेखनी…लेखनी को मेरा प्रणाम है सतीश जी ..।-
इतनी सुंदर समीक्षा, प्रेरणा और उत्साहवर्धन हेतु सादर अभिवादन। धन्यवाद शब्द आपकी टिप्पणी के सामने कुछ भी नहीं है। प्रणाम
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वाह वाह क्या बात है
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बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी
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बहुत सुंदर भाव
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बहुत बहुत धन्यवाद जी
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वाह पाण्डेय जी
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Thank you
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अतिसुन्दर
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Dhanyawad
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