मित्र

“मित्र”

वो मेरा सगा नहीं है ,
मगर भाई से बढ़कर है।

कोमिडन नहीं है,
मगर हंसाता है;
कार्टून से बढ़कर है।

थोड़ा जिदी है,
मगर इतराता नहीं है‌।

बेपरवाह है खुद के लिए,
पर मेरे लिए!
जान देने से घबराता नहीं है।

कभी भले-बुरे के लिए,
गालियां देने वाला!
सनकी बाप,
तो कभी प्यार देने वाली ,
मां सा; बन जाता है।

सब बेमतलब सा
लगता है ,
जब वो ना हो साथ।

हर मर्ज की दवा,
मिले या ना मिले,
मगर मेरे चेहरे पर मुस्कान
उसके साथ होने से मिल जाती हैं।

——मोहन सिंह मानुष

Comments

8 responses to “मित्र”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुन्दर

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar
      मोहन सिंह मानुष

      धन्यवाद जी

  2. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    धन्यवाद जी

  3. मित्रता पर बहुत ही सुंदर रचना भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों ही बहुत उत्तम है और अपने में परिपूर्ण हैं

    1. मोहन सिंह मानुष Avatar

      बहुत-बहुत आभार 🙏सर

      1. Abhishek kumar

        वेलकम

  4. Satish Pandey

    वाह वाह

  5. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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