मिलन की प्यास

आपकी चाहत के तलबगार है
हम।
आओ एक हो जाए हम।।
ढलती गोधूलि , उस पे हवा के झोंके।
उफ,,, रुत भी कहने लगी एक जान है हम।।

Comments

6 responses to “मिलन की प्यास”

    1. Praduman Amit

      Thanks Pandit jee

  1. वाह क्या बात है

    1. बस आपकी समीक्षा हम पर बनी रहे। 

  2. Satish Chandra Pandey

    सुन्दर पंक्तियाँ

    1. शुक्रिया पांडे जी। आपने मेरी रचना को स्तरीय समझा बहुत बहुत धन्यवाद। 

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