मुक्तक

स्वप्न में रोज लिखती हूँ
तुम्हारे नाम की कविता,
कहीं कोई देख ना ले
बस इसी चिंता में रहती हूँ,
इसलिए उन सबूतों को
मिटाकर ही मैं जगती हूँ।

Comments

4 responses to “मुक्तक”

    1. Satish Pandey

      Thanks

    1. Satish Pandey

      Thanks

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