आज कुछ पुरानी सौगात मिली
मैंने अपने कमरे की तलाशी ली।
तो कुछ किताबें धूल में लिपटी हुई,
कुछ खत, कुछ गुलाब के फूल सूखे हुए
कुछ तस्वीरें, कुछ तोहफे
और कुछ बन्द लिफाफे मिले।
जिन्हें छुपाकर रखा था मैंने
भूल गई थी दुनियादारी में पड़कर
आज वो मुठ्ठी भर यादें
मुझे मिल गई।
जिन्हें मैने सबसे छुपाकर अपनी
अलमारी में रख दिया था।
आज वो यादें धूल में लिपटी हुई
मुझे आ मिलीं।
और उनकी स्मृतियों ने
मुझे फिर विचलित कर दिया।
वो मुठ्ठी भर यादें
मुझे मिल गईं।
जिन्हें भूले जमाने हो गए।
मुठ्ठी भर यादें…
Comments
10 responses to “मुठ्ठी भर यादें…”
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Nice
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थैंक्स
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Nice
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🙏
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वाह
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🙏
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👌👌👌
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सही उपमा दी गई है
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पुरानी सौगात होती ही ऐसी है उपमा अलंकार का सुंदर प्रयोग तथा श्रृंगार रस से परिपूर्ण रचना
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बहुत खूब
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