मुस्कुरा कर बोलना,
इन्सानियत का जेवर है।
यूं तेवर न दिखलाया करो,
हम करते रहते हैं इंतज़ार आपका,
यू इंतजार न करवाया करो।
माना गुस्से में लगते हो,
बहुत ख़ूबसूरत तुम
पर हर समय गुस्से में न आया करो।
बिन खता के ही खतावार से रहते हैं हम,
यूं न हमें डराया करो।
एक दिन छोड़ देंगे हम ये जहां,
फिर ढूंढोगे तुम हमें कहां।
तो मुस्कुराओ जी खोलकर,
कह दो जो कहना है बोलकर।
हमको यूं न सताया करो,
मुस्कुराना इन्सानियत का जेवर है।
यूं तेवर न दिखलाया करो।।
____✍️गीता
मुस्कुराना
Comments
12 responses to “मुस्कुराना”
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मुस्कुरा कर बोलना,
इन्सानियत का जेवर है।
यूं तेवर न दिखलाया करो,
हम करते रहते हैं इंतज़ार आपका,
– रोमानियत अंदाज की बहुत खूबसूरत पंक्तियां। मुस्कुराने को प्रेरित करती शानदार रचना। बेहतरीन शिल्प, खूबसूरत भाव।-
इतनी सुन्दर और प्रेरणा देती हुई समीक्षा हेतु आपका बहुत बहुत
बहुत धन्यवाद सतीश जी।आपकी समीक्षा वास्तव में कवि हृदय में उत्साह का संचार करती हैं, हार्दिक आभार सर
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अतिसुंदर भाव
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी 🙏
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मुस्कराहट दिलों को जोड़ती है,
क्रोध रिश्ते, इज्जत और दिल सबकुछ खत्म कर देता है
सुंदर रचना-
समीक्षा के लिए धन्यवाद सर 🙏
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सुंदर रचना गीताजी। वैसे देखा जाए तो सही मायने में मुस्कुराहट की कीमत तेवर झेलने बाद ही तो समझ आती है !
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समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद अनु जी
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सर्वश्रेष्ठ कवि, सर्वश्रेष्ठ आलोचक और सर्वश्रेष्ठ सदस्य सम्मान की बहुत बहुत बधाई गीता जी।
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बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी 🙏
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Nice
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Thank you Mam
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