मुस्कुरा उठे लब मेरे,
देख कर नभ में तारे।
मुस्कुरा उठे लब मेरे,
देख उषा की लालिमा।
भोर की ठॅंडी बहती पवन,
प्रफुल्लित कर गई है मन।
ये परिन्दों का चहचहाना,
कह रहा कविता कोई।
प्रातःकाल ही चाहता है,
आज मेरा मन गुनगुनाना॥
_____गीता
मुस्कुरा उठे लब मेरे
Comments
5 responses to “मुस्कुरा उठे लब मेरे”
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प्रातःकाल ही चाहता है,
आज मेरा मन गुनगुनाना॥
——- बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, बहुत लाजवाब रचना।-
इस सुन्दर और उत्साहवर्धक समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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प्रातः काल का सुंदर वर्णन, अति सुंदर
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बहुत-बहुत धन्यवाद अमिता जी
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बहुत खूब
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