पृथ्वी लिये दो हाँथ”

सौंप रही है देखो पृथ्वी
अपना संरक्षण किन के हाथों में
जिनको आता नहीं सहेजना
प्राकृतिक संसाधनों को
जो ना कर सकते हैं अपनी सुरक्षा
वह पृथ्वी की सुरक्षा कैसे कर पाएंगे !
यही सोचकर डगमगा रहे हैं
पृथ्वी लिए दो हाथ,
कि ये सुकोमल हाथ
क्या पृथ्वी की सुरक्षा कर पाएंगे!!
क्या आने वाले कल में
मैं सुरक्षित महसूस कर पाऊंगी !
यही सोचते हुए पृथ्वी सहम रही है
और कह रही है-
कोई तो हो जो मेरी सुरक्षा कर पाये
प्राकृतिक संसाधनों का हनन होने से बचाए
मेरे वक्ष पर वृक्ष लगाए,
प्रदूषण रोंके, महामारी से मरते लोगों को बचाए।
भूमि पुत्रों को आत्महत्या करने से रोंके,
कोई तो हो जो असल में पृथ्वी दिवस मनाए।।

Comments

15 responses to “पृथ्वी लिये दो हाँथ””

  1. सौंप रही है देखो पृथ्वी
    अपना संरक्षण किन के हाथों में
    जिनको आता नहीं सहेजना
    प्राकृतिक संसाधनों को
    जो ना कर सकते हैं अपनी सुरक्षा
    वह पृथ्वी की सुरक्षा कैसे कर पाएंगे !

    चित्र का यथार्थ वर्णन

  2. क्या बात है अभिषेक जी बड़े दिन बाद आपकी रचना का रसपान करने को मिला पृथ्वी दिवस के उपलक्ष में आपने बहुत ही सुंदर और कम शब्दों में अपनी बात रखी है चित्र का हूबहू वर्णन कर रही है आपकी रचना

  3. बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने पृथ्वी दिवस पर दिए गए चित्र का

  4. अद्भुत लेखन
    पृथ्वी दिवस पर कई सालों बाद आपकी रचना का रसपान करने को मिला है
    बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने सचमुच पृथ्वी अंदर ही अंदर सोचती होगी और सकुचाती होगी कि किन हाथों में मैं आ गई ,
    पृथ्वी का बहुत ही खूबसूरती से मानवीय करण किया है आपने।।

  5. पृथ्वी दिवस पर शानदार प्रस्तुति है आपकी आपने बहुत ही बारीकी से चित्र का वर्णन किया है और पृथ्वी की मानसिकता को तथा दयनीय दशा को अपनी कविता में स्थान दिया है

  6. अति उत्तम रचना अभिषेक जी पृथ्वी दिवस की आपको हार्दिक बधाई

  7. बहुत ही प्यारी और उच्च कोटि के रचना है आप एक सुप्रसिद्ध कवि हैं आपकी रचनाओं का ऐसे ही हमको आनंद प्राप्त होता रहे यह हमारी आकांक्षा है

  8. बहुत ही सटीक और यथार्थ वर्णन किया है आपने अभिषेक जी चित्र का सटीक विश्लेषण किया है आपने

  9. बहुत ही सटीक वर्णन किया है आपने आपकी लेखनी को सलाम है जैसा क्षेत्र है उसका वर्णन भी आपने उसी प्रकार से किया है हम सभी को पूर्ण करना चाहिए कि हम धरती को स्वच्छ बनाएं और प्रदूषण को रोकने अपने स्वार्थ के लिए हम पृथ्वी को छलनी ना करें

  10. आपकी कविता का शीर्षक ही कविता का सटीक वर्णन कर देता है
    पृथ्वी लिए दो हाथ सचमुच चित्र में दिखाया गया है दो हाथों में पृथ्वी तथा दो हाथ सामने फैले हैं
    बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।

  11. बहुत ही सुंदर रचना लिखी है आपने अभिषेक,
    प्रकृति हमारी जीवनदायिनी है और इसका संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है

  12. Psladpura Pilibhit

    पृथ्वी दिवस पर बहुत ही सुंदर कविता है जैसा चित्र दिया गया है बिल्कुल वैसी ही कहता लिखी है आपने आपकी लेखनी जब भी चलते हैं तो कमाल करती है

  13. क्या बात है भाई,
    पृथ्वी दिवस पर बहुत ही सुंदर रचना लिखी है आपने
    जैसा चित्र दिया गया है उसका वैसा ही वर्णन आपने अपनी लेखनी के माध्यम से किया है
    आपकी लेखनी यूं ही अविरल चलती रहे और हमारा मार्गदर्शन करती रहे यही हमारी इच्छा है

    पृथ्वी दिवस की आपको हार्दिक बधाई।।

    आप ऐसे ही साहित्य की सेवा करते रहे।।

  14. अतिसुंदर अभिव्यक्ति

  15. Master sahab

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